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| میرزا محمد قمی متخلّص به «محیط» و ملقّب به «شمس الفصحا» از شاعران خوش قریحهی دوران قاجار است که به سال 1250 ه ق در یکی از روستاهای شهرستان قم متولد شد. تحصیلات خود را در رشتهی علوم عقلی و نقلی در قم و اصفهان به پایان رسانید. سپس به تهران آمد و پس از چندی به جانشینی پدر و برادر خویش که زندگی را بدرود گفته بودند، در دستگاه دوستعلی خان معیّر الممالک که در شمار وزیران و مقرّبان حکومت قاجاریه بود به کار تعلیم دوست محمد خان فرزند وی گماشته شد. به علاوه در انجمن شاعران شرکت میکرد و اشعار خود را میخواند.
| | #تغییر_مسیر[[محیط قمى]] |
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| میرزا محمد در سال 1317 ه. ق. در قم درگذشت و در مزار شیخان قم به خاک سپرده شد. پس از او میرزا حیدر علی مشهور به «مجد الادبا» و متخلّص به «ثریّا» که پدر همسر محیط قمی بود، دیوان او را گردآوری و تدوین کرد. این دیوان در سال 1362 ه ش. در تهران چاپ و منتشر شده است. <ref> فرهنگ شاعران پارسی زبان.</ref>
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| '''عترت یاسین:'''
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| {{شعر}}
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| {{ب| نیمه شب بر سرم آن خسرو شیرین آمدخفته بودم که مرا بخت به بالین آمد }}
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| {{ب| آمد آن گونه که تقریر نمودن نتوانچون توان گفت به تن جان به چه آیین آمد؟ }}
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| {{ب| قامت افراخته، افروخته رخ، طرّه پریشبهر یغمای دل عاشق مسکین آمد }}
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| {{ب| به همه عمر دمی شاد نخواهم دل ریشتا شنیدم که مقامت دل غمگین آمد }}
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| {{ب| دل سودا زده طوف سر کوی تو کندصعوه <ref>صعوه: هر پرندهی کوچک و خواننده به اندازهی یک گنجشک را گویند؛ گنجشک.</ref> را بین که به جولانگه شاهین آمد }}
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| {{ب| کسب دولت مکن ای خواجه که درویشان راترک دولت سبب حشمت و تمکین آمد }}
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| {{ب| من و مدّاحی شاهی که «حسین منّی» <ref> اشاره به حدیث نبوی «حسین منّی و انا من حسین».</ref> مدحتش مادح <ref> مادح: مدح کننده، ستایشگر.</ref> وی ختم نبییّن آمد }}
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| {{ب| آن چنان پای به میدان محبّت بفشردکه سرش زیب سَنان سپه کین آمد }}
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| {{ب| خامس آل عبا، شافع کونین، حسینکه غلامیِّ درش فخر سلاطین آمد }}
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| {{ب| ما سوایش به ندا یاد که فرّخ ذاتشما سوا را سبب خلقت دیرین آمد }}
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| {{ب| توشهی روز جزا مایهی امید «محیط»شیوهی منقبت عترت یاسین آمد <ref>تجلی عشق در حماسه عاشورا؛ ص 213 و 214.</ref> }}
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| {{پایان شعر}}
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| '''سقای شهیدان:'''
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| {{شعر}}
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| {{ب| آن قوی پنجه که آزردن دلهاست فنشالفتی هست نهان با دل غمگین منش }}
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| {{ب| جان رسیده به لب از دوری جان بخش لبشدل به تنگ آمده از حسرت نوشین دهنش }}
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| {{ب| دوش در طرف چمن بلبل شیدا میگفتنوبهار آمد و افزود غمم ز آمدنش }}
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| {{ب| باغ ماند به صف ماریه و لاله و گلبه شهیدان به خون غرقهی گلگون کفنش }}
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| {{ب| ابر در ماتم سقّای شهیدان گریدکه همه عمر بود دیدهی گریان چومنش }}
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| {{ب| نور حق ماه بنی هاشم، عباس که هستمهر او شمع و دل جمع محبّان لگنش }}
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| {{ب| حامل رایت و میر سپه عشق که داشتقوت سیل اجل همت بنیاد کَنش }}
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| {{ب| دستش از تن که بریدند به کف محکم بودرشتهی بندگی و مهر امام زمنش }}
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| {{ب| گفت در ماتم او شاه شهیدان گریاندید افتاده چو در معرکه پر خون بدنش }}
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| {{ب| شد کنون قطع امید من و پشتم بشکستبعد از این وای به حال دل و رنج و محنش }}
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| {{ب| یادم آمد لب خشکیده و چشمان تَرشجگر سوخته از غم دل خون از حزنش }}
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| {{ب| ز آن نبردش شه دین سوی شهیدان دگرکه میسر نشد از معرکه برداشتنش }}
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| {{ب| برگرفتن نتوان پیکر آن کشته ز خاککه نه تن مانده به جا و نه به تن پیرهنش <ref>همان؛ ص 215.</ref> }}
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| {{پایان شعر}}
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| '''رباعی:'''
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| {{شعر}}
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| {{ب| صبر تو فزون ز ممکنات است حسینخون از عطشت دل فرات است حسین }}
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| {{ب| در عرصهی کربلا به مهر شه عشقکاری کردی که عقل مات است حسین }}
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| {{پایان شعر}}
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| ==منابع==
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| دانشنامهی شعر عاشورایی، محمدزاده، ج 2، ص: 996-998.
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| ==پی نوشت==
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| [[رده:ادبیات]] | |
| [[رده:شاعران]]
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| [[رده:شاعران فارسی زبان]]
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| [[رده:شاعران متأخر]]
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